सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Ruk jao ,Thahar jao ,khud se pyar kro || love yourself hindi poem || fake world hindi poem || motivational life poem in hindi || Today's reality life hindi poem - Anita Deora { Am a Villager }

Am a villager -Anita Deora
यहाँ सभी फ़रेबी हैं,
            किस - किस की बेवफाई ढूंढते फिरोगे।
यहाँ तुम्हारी सोच की कदर नही हैं,
           किस - किस को फ़ितरत बताते फिरोगे।
यहाँ तुम्हें भीड़ में शामिल किया गया हैं,
           किस - किस को किनारा बताते फिरोगे।
यहाँ तुम्हारे बारे में बातें किस्सों में होती हैं,
         किस - किस को कहानी बताते फिरोगे।
यहाँ मासूमियत को मजाक बना रखा हैं,
       किस-किस को साबित करते फिरोगे।
यहाँ शोर को सुना जाता हैं ,
       किस - किस को चुप्पी सुनाते फिरोगे।
रुक जाओ,ठहर जाओ यहाँ तुम्हे नही समझा जाता है,
       यहाँ तुम से बेहतर खुद को कोई नही समझ सकता हैं।
                                          - Anita Deora 
                                             Am a villager 
।। आभार।।
 

      Also read one ---

  




   

  

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो स्तब्ध सी,शिवा में पूर्ण,खुद में अपूर्ण।।|हिंदी कविता 2021 by Anita Deora |Hindi Poem |Hindi poetry for self lovers .

Am a villager -Anita Deora वो स्तब्ध सी,शिवा में पूर्ण थी.... वो स्तब्ध थी, शब्दों के आडम्बर में शून्य थी, वो खुद के मौन से पराजित थी, अंर्तआत्मा में विजय थी, वो किसी की पर्यायवाची नही, अब खुद का विलोम थी, वो तृष्णा से परे,संवेदनाओं से भरी, अब पूर्णत अलंकृत थी, वो ओउम नमः शिवाय में विलुप्त सी, शिवा तुझमें पूर्ण,खुद में अपूर्ण थी।। ।।आभार।।      Visit blog Am a villager                 ALSO READ ONE -  ➡️ आजादी को प्यारे पँछी                  ➡️  Speak to yourself ➡️  शांति के पीछे, दिल का शोर from a girls heart     ➡️ रुक जाओ,ठहर जाओ, खुद से प्यार       ➡️    शिक्षा के आयाम  

आजादी को प्यारे पँछी,Hindi poem by Anita Deora -www.amavillager.blogspot.com

Am a villager  आजादी को प्यारे पंछी ,सोने के पिंजरों से अनीति रखते हैं,  देर तक रहने वाले खामोश,बाहर आते ही शोर करते हैं, समझाइश या तो ज्यादा है उन्हें या हैं ही नही, तभी वो विचार नही कर पाते उड़ना जरूरी हैं,  या समय की ख़बर रखना,की आना है वापस सांझ को घर, यह डर उन्हें बाहर निकलने देता ही नही, की हुनर रखते हैं जो उड़ने का भी ओर ठहरने का भी, वो थोड़े हंस जाते हैं उन पर, गर हंसने से सूंकूँ मिले उनको तो उनके साथ मुस्करा देने में कोई गम नही,मगर वो आते हैं पँखो को काटने तो सामना करने से कतराते नही, की मिले इतनी हिम्मत की कटरता से जवाब दे सके, पर यहां भी कुछ हालातो से समझौता कर जाते हैं,  हम अनु बो हैं जो मिले या ना मिले पर  रब की मर्जी मानकर खुश रहना सिख जाते हैं,  तोह आती हैं देर से ही सही एक बात जहन में  जब कोई मसला ही नही फिर मलाल कैसा डर का,  फिर अनीति को नीति बनाने की जिद क्यों कर जाते हैं ,  खुद से...।।     ।। आभार ।।  ➡️ Visit blog Am a villager       Also read   ➡️    वो स्तब्ध सी,शिवा तुझमें प...